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poems by Haripriya

तन रूपी इस कवच में कान्हां मन की नगरी बसती है
मन की नगरी में मेरे कान्हां मनमोहन जी रहते हैं
इस नगरी में मैंने मोहन, भक्ति बीज बोये हैं एसो
तुम सींचो इनको मेरे मोहन , बन जायें ये वट वृक्ष जेसो
कुछ तो यतन करो मेरे कान्हां, तन की मिटटी बदल भी जाए
मन की नगरी भक्ति वट संग , नए कवच में फिर रम जाए
बार बार जो बिखरे नगरी, बननें में जनम कट जाए
शाम ढले तक तुमरा मंदिर , उसमें कान्हां फिर बन पाए
मन के मंदिर मेरे मोहन , अब तो कुछ एसे बस जाओ
भक्ति वट की सभी जड़ों संग, बंधन बांध संग में आओ
नए रूपों में नई माटी में तुमरी छवि न बिसरे कान्हां
मंदिर तुमरा मिले वहां ,जहाँ छुटा था पिछले जनम में कान्हां
हर इक कल्प के हर इक पल में , तुमको कभी न भूलूं फिर
रहे हरा भरा भक्ति वट , माटी चाहे बदले फिर

हरिप्रिया